सोने की चिड़िया भारत को क्यों कहा जाता था – एक आवलोकन

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भारत सोने की चिड़िया का देश – हमारा कल और आज

कभी भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, फिर क्या हो गया कि यह देश अब निर्धन के कतार में खड़ा नजर आता है । आखिर कैसे हम एक गरीब देश बन गए ?

भारत सोने की चिड़िया का देश था, इस कथन में कही भी कोई अतिशयोक्ती नहीं है। यह कोई बहुत पुरानी बात भी नहीं है । तुलनात्मक अध्यन के लिए बहुत पीछे जाने की भी जरूरत नहीं। आइये सन 1917 पर ही अपनी एक दृष्टी डालते हैं। और देखिये, तब हम कहाँ थे, कैसे कहाँ आए,  और आज हम कहाँ  खड़े हैं ?

सोने की चिड़िया
1917:  $ 13 डॉलर (USA) =  ₹ 1 रूपया
1947:  $ 1 डॉलर (USA) =  ₹ 1 रूपया
2015: $ 1 डॉलर (USA)  =  ₹ 63.50 रूपया
2017:  $ 1 डॉलर (USA)  =  ₹ 65.20 रूपया

 

उपर्युक्त टेबल में डॉलर से रुपये का तुलनात्म लेखा जोखा यह दर्शाने के लिए प्रयाप्त है कि कैसे हमारे रुपये का अवमूल्यन डॉलर के मुकाबले में  समय के साथ साथ होता रहा है और हम इसके लिए कुछ नहीं कर सके । 

क्या इस कथन को मान लिया जाए कि अब हम सोने की चिड़िया  से मिटटी की चिड़िया बनते जा रहे हैं ? या फिर यूँ कहें की हम अपने महान देश को अब एक  मिटटी की चिड़िया बना चुके हैं।

इस बात को सोचे जाने की जरूरत है। हमें अपना आत्म अवलोकन अवश्य करना चाहिए ।

हम कैसे सोने की चिड़िया के देश से एक गरीब देश के रूप में अग्रषित हो गए, इस बस्तु इस्थिति को समझने के लिए आइये अपने इतिहास पर एक दृष्टि डालें ।

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सोने की चिड़िया से एक गरीब देश की यात्रा

यह एक प्रमाणित तथ्य है कि धन धान्य से परिपूर्ण इस देश को लूटने के लिए सदियों से लुटेरे यहाँ आते रहे हैं । यह इस्थिति मुग़ल काल में बद से बदतर हो गई  थी  अरबी लुटेरे यहाँ आते थे, हमें लुटते थे और फिर चले जाते थे । हमारा देश जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था एक कंगाल देश बनने लगा ।

बाद में इन लुटेरों की एक जमात को यह लगा कि यह देश तो धन धान्य से भरपूर होने के साथ साथ यहाँ की आबो हवा, यहाँ की नदियाँ, पहाड़ वगैरह तो स्वर्ग की अनुभूति देते हैं , तो उन लोगों ने यही पर बस जाने का मन बना लिया ।

फिर क्या हुवा ? यहाँ के लोगों को मारा खसोटा जाने लगा । उनकी सम्पतिओं को तो लुटा जाता ही, उनके धर्म को भी परिवर्तन करने का एक लम्बा सिलसिला चल पड़ा था। भारत शनै: शनै: सोने की चिड़िया से एक गरीब राष्ट्र के रूप में परिवर्तित होने लगा ।

यहाँ के लोग जो सीधे थे, धार्मिक परिवृति के होते, लोगों की भलाई करने में विश्वाश करते थे । तो क्या हमारी मान्यता कि “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और हमारी अच्छाईयां ही हमें ले डूबी ?

प्राचीन काल में भारत हरेक दृष्टि से पूर्ण विकसित था । यहाँ की शिल्प कला विश्व में सर्व श्रेष्ठ मानी जाती थी, यहाँ के लोग समुद्री रास्तों से अनेकानेको देशो के साथ ब्यापार करते थे, यहाँ नालंदा और तक्छ्शिला नामक विश्व विख्यात अध्यन केंद्र थे । हमारा देश ना सिर्फ आर्थिक दृष्टी से समृद्ध था, बल्कि हम अध्यात्मिक और ज्ञान के मामले में भी अग्रणी थे ।

हमारा देश सचमुच में ही सोने की चिड़िया का देश था ।

प्राचीन भारत ना सिर्फ एक कृषि प्रधान देश था, बल्कि हम आद्योगिक छेत्र में भी काफी विकाश किया था । हमारे देश में गृह उद्योग का बोलबाला था । हम कपास, काली मिर्च, गरम मसाले आदि का ब्यापार दुसरे देशों के साथ करते थे, और यह ब्यापार भरपूर फला-फुला था ।

भारत विब्भिन्न धातुओं से औजार बनाने के कला में भी महारत हासिल किया हुवा था । हमारे औजारों की मांग विश्व के सुदूर प्रान्तों में भी खूब थी ।

यहाँ के ब्यापारी बाहरी देशो से ब्यापार में वहाँ से सोना लाया करते थे, इस तरह भी इस देश में सोने, चंडी, हीरे, जवाहरात की भरमार हो गई । और धीरे धीरे लोग भारत को सोने की चिड़िया के नाम से बुलाने लगे थे ।

 

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