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हरियाली तीज ( Hariyali Teej ): सावन में तीज का पौराणिक महत्व

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Importance of Hariyali Teej
सावन में हरियाली तीज का पौराणिक महत्व

हरियाली तीज का त्यौहार भारत के कोने-कोने में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है. यह त्यौहार भारत के उत्तरी क्षेत्र में हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है

सावन का आगमन ही इस त्यौहार के आने की आहट सुन्नाने लगता है समस्त सृष्टि सावन के अदभूत सौंदर्य में भिगी हुई सी नज़र आती है सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज के रुप में मनाया जाता है. यह हरियाली तीज ( Hariyali Teej ) के नाम से भी जानी जाती है. यह त्यौहार मुख्यत: स्त्रियों का त्यौहार माना जाता है
 
हाथों में रचि मेंहंदी की तरह ही प्रकृति पर भी हरियाली की चादर सी बिछ जाती इस न्यनाभिराम सौंदर्य को देखकर मन में स्वत: ही मधुर झनकार सी बजने लगती है और हृदय पुलकित होकर नाच उठता है , इस अवसर पर स्त्रियाँ गीत गाती हैं, झूला झूलती हैं और नाचती हैं इस समय वर्षा ऋतु की बौछारें प्रकृति को पूर्ण रूप से भिगो देती हैं

Hariyali-Teej


इस समय वर्ष अपने चरम पर होती है प्रकृति में हर तरफ हरियाली की चादर सी बिछी होती है और शायद इसी कारण से इस त्यौहार को हरियाली तीज कहा जाता है सावन की तीज Hariyali Teej ) में महिलाएं व्रत रखती हैं इस व्रत को अविवाहित कन्याएं योग्य वर को पाने के लिए करती हैं तथा विवाहित महिलाएं अपने सुखी दांपत्य की चाहत के लिए करती हैं. देश के पूर्वी इलाकों में लोग इसे हरियाली तीज Hariyali Teej ) के नाम से जानते हैं इस समय प्रकृति की इस छटा को देखकर मन पुलकित हो जाता है जगह-जगह झूले पड़ते हैं और स्त्रियों के समूह गीत गा-गाकर झूला झूलते हैं

तीज का पौराणिक महत्व

 
सावन की तीज Hariyali Teej ) का पौराणिक महत्व भी रहा है. इस पर एक धार्मिक किवदंती प्रचलित है जिसके अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए इस व्रत का पालन करती हैं और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें भगवान शिव वरदान स्वरुप प्राप्त होते हैं मान्यता है कि श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन देवी पार्वती ने सौ वर्षों की तपस्या साधना पश्चात भगवान शिव को पाया था इसी मान्यता के अनुसार स्त्रियां माँ पार्वती का पूजन करती हैं

हरियाली तीज पूजा एवं व्रत ( Hariyali Teej )

 
अपने सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिये स्त्रियां यह व्रत किया करती हैं. इस दिन उपवास कर भगवान शंकर-पार्वती की बालू से मूर्ति बनाकर षोडशोपचार पूजन किया जाता है जो रात्रि भर चलता है सुंदर वस्त्र धारण किये जाते है तथा कदली स्तम्भों से घर को सजाया जाता है. इसके बाद मंगल गीतों से रात्रि जागरण किया जाता है इस व्रत को करने वालि स्त्रियों को पार्वती के समान सुख प्राप्त होता है

 

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भारत के विभिन्न क्षेत्रों में हरियाली तीज

 
तीज का त्यौहार भारत के अनेक भागों में बहुत जोश और उल्लास के साथ मनाया जाता है उत्तर भारत के क्षेत्रों जैसे बुन्देलखंड, झाँसी, राजस्थान इत्यादि क्षेत्रों में हरियाली तीज Hariyali Teej ) के नाम से बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है पूर्वी उत्तर प्रदेश, बनारस, गोरखपुर, जौनपुर, सुलतानपुर आदि जिलों में इसे कजली तीज के रूप में मनाया जाता है

तीज का लोक जीवन पर प्रभाव

 
हरियाली तीज का आगमन वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही आरंभ हो जाता है. आसमान काले मेघों से आच्छ्दित हो जाता है और वर्षा की बौछर पड़ते ही हर वस्तु नवरूप को प्राप्त करती है ऎसे में भारतीय लोक जीवन में हरियाली तीज या कजली तीज Hariyali Teej महोत्सव बहुत गहरा प्रभाव देखा जा सकता है तीज पर मेहंदी लगाने और झूले झूलने का विशेष महत्त्व रहा है तीज समय नवयुवतियाँ हाथों में मेंहदी रचाती हैं तथा लोक गीतों को गाते हुए झूले झूलती हैं हरियाली तीज Hariyali Teej ) के दिन खुले स्थान पर बड़े–बड़े वृक्षों की शाखाओं पर, घर की छत की कड़ों या बरामदे में कड़ों में झूले लगाए जाते हैं जिन पर स्त्रियां झूला झूलती हैं हरियाली तीज Hariyali Teej के दिन अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं

इस अवसर पर विवाह के पश्चात पहला सावन आने पर नव विवाहिता लड़की को ससुराल से पिहर बुला लिया जाता है विवाहिता स्त्रियों को उनके ससुराल पक्ष की ओर से सिंधारा भिजवाया जाता है जिसमें वस्त्र, आभूषण, श्रृंगार का सामान, मेहंदी और मिठाई इत्यादि सामान भेजा जाता है

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