Om Namah Shivaya : ॐ नमः शिवाय

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Origin of Shiva and Significance of  ‘Om Namah Shivaya’ Maha Mantra

शिव लिंग की उत्‍पत्ति और महिमा गाथा

कहते हैं ॐ नमः शिवाय ( Om Namah Shivaya ) मन्त्र इतना खुद में सर्वशक्तिमान और उर्जा श्रोतों से परिपूर्ण है कि मात्र इसके वाचना मात्र से ही प्राणी के समस्त दुखों का विनाश और कामना की प्रतिपूर्ति हो जाती है ।
 
Om Namah Shivaya
 
शिवलिंग भगवान शंकर का प्रतीक है। 
 
शिव का अर्थ है – ‘कल्याणकारी’। लिंग का अर्थ है – ‘सृजन’। सर्जनहार के रूप में उत्पादक शक्ति के चिन्ह के रूप में लिंग की पूजा की जाती है। स्कंद पुराण में लिंग का अर्थ लय लगाया गया है। कहते हैं कि लय ( प्रलय) के समय अग्नि में सब भस्म हो कर शिवलिंग में समा जाता है और सृष्टि के आदि में फिर लिंग से सब प्रकट होता है। 
 
लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपर प्रणवाख्य महादेव का वास हैं।
 
लिंग के संबंद्ध में बहुत सारी भ्रांतियां फैलाई गई हैं। अर्थ का अनर्थ निकाल कर और प्रत्यक्छ शाब्दिक अर्थ को ही आधार मान कर लोग लिंग के गूढ़ अर्थ से विमुख रहते हैं । जैसा कि पहले ही वर्णन कर चूका हूँ कि लिंग उत्पादक शक्ति के रूप में पूजा जाता रहा है और यह असीम उर्जा का श्रोत है । पूजा के लिए दो प्रकार के लिंगों का वर्णन मिलता है । स्फटिक लिंग सर्वकामप्रद है जबकि  पारा लिंग से धन, ज्ञान, ऐश्वर्य और सिद्धि की प्राप्ति होती है। ॐ नमः शिवाय ( Om Namah Shivaya ) मन्त्र सार्वजनक है और सर्व दुःख हारा है ।  श्रृष्टि की रचना सम्बन्धित एक रोचक कहानी आइये मैं आपको सुनाता हूँ ।
 
श्रृष्टि की रचना करने के लिए ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम महादेव जी से कहा कि हे शिव आप समस्त भूतों की श्रृष्टि प्रारंभ करें । महादेव इस कार्य के समापन में भूतगणों  के नाना दोषों को देख कर बहुत दुखी हुवे और उन्होंने जल समाधी ले ली और चिरकाल तक तप करते रहे। ब्रह्मा जी ने बहुत प्रतीक्षा के उपरांत भी जब शिव को जल में ही पाया और  सृष्टि का विकास होते नहीं देखा तो उन्होंने अपने मानसिक बल से एक दूसरे भूतस्त्रष्टा की उत्पत्ति की। इस भूतस्त्रष्टा को विराट पुरुष के नाम से भी जाना जाता है । ब्रह्मा जी ने उस विराट पुरुष से श्रृष्टि को आगे प्रशय करने को कहा ।  इस पर उस विराट पुरुष ने कहा कि हे पिता अगर यदि मुझसे ज्येष्ठ कोई नहीं हो तो मैं सृष्टि का निर्माण करूंगा।  ब्रह्मा जी ने इस पर उस विराट पुरुष को आश्वस्त किया कि उनसे ज्येष्ठ सिर्फ शिव हैं लेकिन वो जलमग्न हैं अतः सृष्टि निर्माण का कार्य उन्ही को करना है ।
 
विराट पुरुष ने श्रृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में चार प्रकार के प्राणियों का विस्तार किया। सृष्टि के प्रारंभ होते ही निर्मित प्रजा भूख से पीड़ित हो प्रजापति को ही खाने की इच्छा से उनकी तरफ दौड़ी। तब आत्मरक्षा के निमित्त प्रजापति ने ब्रह्मा जी से प्रजा की आजीविका निर्माण का आग्रह किया। ब्रह्मा ने अन्न, औषधि, हिंसक पशु के लिए दुर्बल जंगल-प्राणियों आदि के आहार की व्यवस्था की। इस तरह उत्तरोत्तर प्राणी समाज का विस्तार होता गया। 
Lord Shiva
 
शिव तपस्या समाप्त कर जल से जब बहार निकले तो विविध प्राणियों को निर्मित देख क्रुद्ध हो उठे तथा उन्होंने अपना लिंग काटकर फेंक दिया जो कि भूमि पर जैसा पड़ा था, वैसा ही प्रतिष्ठित हो गया। ब्रह्मा जी ने इस पर पूछा कि हे महादेव इतना समय जल में रहकर आप क्या करते रहे और आपने  लिंग उत्पन्न कर फिर उसे इस प्रकार क्यों काटकर फेंक दिया? इसपर शिव ने जबाब दिया कि हे  पितामह, मैंने जल में तपस्या से अन्न तथा औषधियां प्राप्त की हैं। इस लिंग की अब कोई आवश्यकता नहीं रही, क्योंकि  प्रजा का निर्माण तो हो चुका है। इसलिए इसे फेक देना ही उचित है । कहते हैं कि ब्रह्मा जी  बहुत कोशिषों के बाद भी शिव के क्रोध को शांत नहीं कर पाये थे। शिव से लिंग विच्छेदन की एक दूसरी कथा भी है जिसका मैं आगे यहाँ वर्णन करूँगा । यहाँ एक बार पुनः आप लोगों को याद दिला दूँ कि लिंग का तात्पर्य इसके शाब्दिक अर्थ से नहीं है बल्कि यह एक उर्जा पुंज है जिससे जीवन का संचार होता है, श्रृष्टि का निर्माण – विस्तार होता है ।

कहते हैं कि दक्ष-प्रजापति ने अपने यग्य में ‘शिव’ का भाग नहीं रखा तो इससे कुपित होकर माँ पार्वती ने दक्ष के यग्य मंडप में योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर दिया । जब भगवान शिव को यह बात पता चली तो वह अत्यंत क्रुद्ध हुवे और अपना आपा खो दिए । वियोग की इस्थिति में  नग्न अवस्था में भगवान शिव पृथ्वी पर विचरण करने लगे । एक बार वे अपनी इसी अवस्था (नग्नावस्था) में ब्राह्मणों की नगरी में पहुँच गए । वहां शिवजी के सम्मोहक रूप को देखकर भूदेव की स्त्रियां [भार्या ] उन पर मोहित हो गईं । स्त्रियों की इस मोहित अवस्था को देखकर और शिव को इसका दोषी मानकर  ब्राह्मणों ने शिवजी को शाप दे दिया कि वे  तत्काल ही लिंग विहीन हो जाएँ । इसतरह भगवान शिव ब्राह्मणों के शाप से ग्रसित हो गए तथा लिंग विहीन हो गए  । इसके कारण तीनों लोकों में त्राहि त्राहि और घोर उत्पात होने लगा। ज्ञातब्य हो कि की लिंग का यहाँ शाब्दिक अर्थ नहीं है । लिंक शक्ति पुंज है, उर्जा का श्रोत है, उसी से श्रृष्टि का निर्माण और प्रसार होता है । जब उर्जा पिंड लिंग भगवान शिव से विच्छेदित हो गया तो पूरी श्रृष्टि ही उर्जा शून्य होने लगी ।
 
ऐसी अवस्था में समस्त देव ,ऋषि ,मुनि व्याकुल होकर ब्रह्माजी की शरण में गए। उन्होंने ब्रह्माजी से इस समस्या का समाधान माँगा । ब्रह्माजी  ने अपने योगबल से शिवलिंग के अलग होने का कारण जान लिया और समस्त देवताओं ,ऋषियों ,एवं मुनियों को साथ लेकर शिवजी के पास गए । ब्रह्मा जी  ने शिवजी से प्रार्थना की कि आप अपने लिंग को पुनः धारण करें अन्यथा तीनों लोक नष्ट हो जायेंगें । 
Rudra Avatar
स्तुति को सुनकर भगवान् शिव बोले कि हे पितामह अगर सभीलोग इस विच्छेदित लिंग की पूजा प्रारंभ कर दें तो ही मैं अपने लिंग को पुनः धारण कर पाउँगा। शिवजी की बात सुनकर सर्वप्रथम ब्रह्मा ने सुवर्ण का शिवलिंग बनाकर उसका पूजन किया | पश्चात देवताओं ,ऋषियों और मुनियों ने शिवलिंग बनाकर पूजन किया | तभी से शिवलिंग के पूजन का प्रारंभ हुआ ।
 
कहते हैं कि कलियुग में जो लोग किसी तीर्थ में मृतिका के शिवलिंग बनाकर उनका हजार बार अथवा लाख या करोड़ बार सविधि पूजन करते हैं वे स्वयं शिव स्वरूप हो जाते हैं । अघोर पंथ का निर्माण इसी प्रथा के स्वरुप हुवा माना जाता है ।
 
जो मनुष्य किसी तीर्थ पर  मिटटी,भस्म,गोबर अथवा बालू का शिवलिंग बनाकर एक बार भी उसका सविधि पूजन करता है वह दस हजार कल्प तक स्वर्ग में निवास करता है । सामान्य मनुष्यों  द्वारा तीर्थाटन में शिव की विधिवत पूजा करने का प्रवधान इसी प्रथा का हिस्सा माना जाता है । शिवलिंग का विधि पूर्वक पूजन करने से मनुष्य धन, धान्य, विद्या, ज्ञान, सद बुद्धि, दीर्घायु होकर अंत में मोक्ष की प्राप्ति करता है क्योंकि वह अपनी शिव लिंग की पूजा के कर्म में शक्ति श्रोत की उपासना कर रहा होता है ।
 
जिस स्थान पर शिवलिंग का पूजन होता है, वह स्थान तीर्थ स्थान नहीं होते हुआ भी तीर्थ सदृश्य बन जाता है । जिस स्थान पर शिवलिंग का पूजन होता है , उस स्थान पर अगर किसी मनुष्य की मृत्यु होती है वह शिवलोक को प्राप्त होता है । जो ब्यक्ति शिव, शिव ,शिव नाम का उच्चारण करता है, या ॐ नमः शिवाय ( Om Namah Shivaya ) मन्त्र का जाप करता है, वह परम पवित्र एवं परम श्रेष्ठ हो जाता है ।
 
शिव मन्त्र के संबंद्ध में कुछ कथा और धारणाए अनादि काल से प्रचलित हैं जिसका वर्णन मैं निचे दे रहा हूँ । 
 
शिव पुराण संहिता के अनुशार सर्वज्ञ शिव ने संपूर्ण देहधारियों के सारे मनोरथों की सिद्धि के लिए ‘ॐ नमः शिवाय’ ( Om Namah Shivaya ) मन्त्रमंत्र का प्रतिपादन किया है। यह आदि षडाक्षर मंत्र संपूर्ण विद्याओं का बीज है। जैसे वट बीज में महान वृक्ष छिपा हुआ है, उसी प्रकार अत्यंत सूक्ष्म होने पर भी यह मंत्र महान अर्थ से परिपूर्ण है। ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र  में षडाक्षर है, अर्थात इस मंत्र में छहों अंगों सहित संपूर्ण वेद और शास्त्र विद्यमान हैं । 
 
कहते हैं भगवान् शिव द्वारा मृत्यु पर भी विजय प्राप्त करने के लिए महामृत्युंजय मन्त्र का प्रतिपादन किया गया  जो निम्न है  । 
 
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिंम् पुष्टिवर्धनम् । 
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।। 

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